मेरी जिन्दगी को सोंच और खूबियाँ: कृष्ण कुमार
मै कृष्ण:-जिन्दगी जिन्दा दिली का नाम है, मुर्दे भी कोई जिन्दगी जीते हैं...?
:- जब भी कभी अपने आप को अन्दर झाँक कर देखता हूँ तो एक बात सपने में भी हमेशा दीखता है और वो की क्या हम इस समाज के लायक हैं भी या नही....?
:- क्या अगर कोई गलत कहे और कहता रहे उसमे अगर मै टोकता हूँ, अपनी राय रखता हूँ तब क्या कोई गुनाह करता हूँ..?
:- जब भी समाज को देखता हूँ तो एक बात साफ़ झलक देती है और वो यह की किसी को नीचा दिखा कर अपने आप को उपर करो और वो भी निजी स्वार्थ के कारण, अगर समाज, किसी समुदाय को फायदा होता है तब चलो एक आदमी को जलील करदो और उस फायदे का लुफ्त पुरे समाज के साथ मिल बाँट कर उठाओ...
:- कोई यह कैसे समझ लेता है की दुनियां और उस समाज के अंदर उसकी एक अहमियत होती है...
:- रामायण में दिखाया गया की रावण से बड़ा ज्ञानी नही था लेकिन उसके अंदर अहंकार मौजूद था, तो उसका विनाश हुआ लेकिन इस कलयुग में क्या कभी कुछ ऐसा होगा...?
:- सभी के अंदर एक प्रकार की प्रवृति हो गई की जितना लुट सको उतना लुट लो, नुकशान क्या हो रहा यह किसी को नही दीखता...
:- क्या सोंचता है कोई, सोंचता है की मै रावण हूँ, मै रामायण में नहीं हूँ या कुछ और..?
:- अभी का जो समय है कुछ लोगों को जानता हूँ अपने सगे मामू अपने भांजे और भांजी को अपने शहर वाले मकान में नहीं रखते, नहीं रहने देते , कहते हैं की अपना इंतजाम करो या घर चलेजाओ...क्या यह उचित है...?
हमें जितना समझ आया उतना लिखा हूँ फिर कभी वक्त मिलने पर लिखने का काम करूँगा, यह आम जिन्दगी में सभी मनुष्य के साथ होता है..
ऐसा किसी एक के साथ नहीं..?
आखिर इसका उपाय क्या होगा...क्या कभी इसे सुधार नहीं किया जा सकता...
कलयुग तो अभी बच्चा और व्यश्क है इतनी गन्दी सोंच...
कृष्ण कुमार सिंह:-
बिहार के नालंदा जिले का मूल निवासी हूँ..
08873724726,07079619625

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